श्रीश्रीअनुकूलचन्द्र के जीवनवृद्धिवादी सिद्धान्त का मूलतत्त्व : एक समाज वैज्ञानिक अध्ययन

श्रीश्रीअनुकूलचन्द्र के जीवनवृद्धिवादी सिद्धान्त का मूलतत्त्व : एक समाज वैज्ञानिक अध्ययन

326.00

  • श्रीश्रीअनुकूलचन्द्र के जीवन-दर्शन पर आधारित
  • धर्म और विज्ञान का समन्वय
  • युवाओं के लिए शोधात्मक प्रेरणा
  • सामाजिक समस्याओं का समाधान
  • भौतिकवाद और अध्यात्म का मिलन
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About The Book

श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र इस यूग का एक अनन्य मानव प्रेमी और एक पूर्ण मानव के रूप में दुनिया के तमाम समस्याओं का मूर्त्तमान समाधान है। इस पुस्तक में श्रीश्रीअनुकूलचन्द्रजी के जीवन-दर्शन आधारित वैचारिक भावना से आधुनिक सामाजिक समस्यायों का कारण तथा समाधान की दिशा में मिलने वाला भावनाओं के द्वारा पाठकों को विशेष रूप से यूवा मन में एक शोधात्मक चिंतन का संचार कर सकेगा।

लेखक की भूमिका और उद्देश्य

इस पुस्तक के लेखक डा० मुखर्जी प्रथम जीवन में एक भौतिकवादी दार्शनिक विचारधारा से प्रभावित थे, लेकिन भौतिकवाद का नया स्वरूप द्वारा श्रीश्रीअनुकूलचन्द्रजी के जीवनदर्शन के प्रति आकृष्ट होने के पश्चात इसपर उन्होंने शैक्षिक शोध सम्पन्न किया है। इसलिए पुस्तक में धर्म और विज्ञान का समन्वय के साथ भौतिकवाद और अध्यात्मवाद का मिलन देखने को मिलता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और निष्कर्ष

लेखक के अनुसार – “मैंने श्रीश्रीअनुकूलचन्द्रजी के धार्मिक विचारों में एक अद्भुत क्रान्तिकारी वैज्ञानिक दृष्टिकोण पाया……अस्तित्व को धारण करने वाला विज्ञान ही धर्म है, और वह एक है,…..सम्प्रदाय धर्म नही है…….वस्तु में है existential-urge और वही है ईश्वर, और ईश्वर एक है….अध्यात्मिक साधना एकप्रकार मनोबैज्ञानिक चिकित्सा है……प्राकृतिक सूत्रानुसार विवाह संस्कार से अच्छे मनुष्य का जन्म होता है और वह उन्नत समाज निर्माण का आधारशिला है,……वैशिष्ट्य-भिन्नता सृष्टि के प्रत्येक जीवों में भिन्न वर्ण के रूप में पाया जाता है,….चारित्रिक कमजोरी से औद्योगिक गिरावट तथा आर्थिक संकट पैदा होती है,…” आदि।

पुस्तक की सार्थकता

श्रीश्रीअनुकूलचन्द्रजी ने इसप्रकार वर्तमान दुनिया को सर्वांगीण उन्नत बनाने का कार्यक्रम को अंजाम देने के लिए अतीत को परिपूरण करते हुए एक आदर्श प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक इसी प्रस्तुति का एक क्षुद्र दर्पण है।

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